Saturday , 5 April 2025

“बनाकर दीये मिट्टी के, जरा सी आस पाली है… मेरी मेहनत खरीदो लोगों, मेरे घर भी दीवाली है”

बनाकर दीये मिट्टी के, जरा सी आस पाली है… मेरी मेहनत खरीदो लोगों, मेरे घर भी दीवाली है। किसी शायर की लिखी ये कविता कुम्हारों के हालात को बाखूबी बयां कर रही है। क्योंकि हमारी संस्कृति और परंपराओं पर आधुनिक जमाने की चकाचैंध भारी पड़ रही है। पहले के जमाने में जहां कारीगरों के मिटी के दियो को तरजीह दी जाती थी, तो वहीं अब मिट्टी के दीये की जगह बिजली के बल्ब व लडिया रोशनी चमका रहे हैं। इन चमकते बल्ब और लड़ियों ने लोगों के घर तो रोशन किए लेकिन हमारे कुम्हारों के घर में अंधेरा कर दिया। इलेक्ट्रोनिक सामान की डिमांड ज्यादा होन कुम्हारो का पारंपरिक व्यवसाय प्रभावित हुआ है। कुम्हार ऐसे ही मिटी के दिए बनाकर ग्राहको की राह ताक रहे हैं। 

घर- घर में जहां देसी घी व तेल के दिए जलाए जाने की परंपरा होती थी तो वहीं अब मोमबत्ती ने दीये का स्थान लिया और अब तो बिजली से जगमगाने वाले दीये ही घरों में दिखाई देते हैं। बाजार में बिजली से चमकने वाले स्वास्तिक, ओम, ओंकार, मल्टी कलर की रिमोट वाली स्टिप, लेजर लाइट, लड़ी, गुबारे लाइट, दीये की स्टिप के अलावा विभिन्न प्रकार की लड़ियां मिलती हैं जिस कारण दीयो की मांग दिन ब दिन कम हो रही है और एक और पारंपरिक प्रथा खत्म होने की कदार पर है। 

लोग तो केवल नाम मात्र के लिए ही मिटी के दिए खरीद रहे हैं। महंगी चीजों पर पानी की तरह पैसा बहाने वाले क्या जाने कि कुम्हार किस तरह से आज इस परम्परा को संभाले बैठा हुआ है। अब तो कुम्हार के बच्चे भी इस काम को आगे जारी नहीं रखना चाहते। अगर इस तरह से चलता रहा तो आने वाले समय मे इस परंपरा को शायद ही जीवित रखा जा सकेगा।

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